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"भूख"

Posted On: 30 Jan, 2014 कविता,Contest में

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”’भूख ”’

आज मन में आई मैरे
ढांक के पत्ते हरे हरे
ले आउ जंगल से तोड़कर
बनाऊ सुंदर सी पत्तल
फिर प्यार से भोजन बनाऊ
परोसू किसी भूखे को
जिसे सचमुच चाहत है
जिसे चाहिए केवल” रोटी ”
फिर सोचा उन्हें भी बुला ही लु
जो बहुत ही ”भूखे ” है
धन ,दौलत ,खजानों के
पर परोसने के लिये
न धन दौलत न खजाना ………..
बनाने की विधि याद मुझे |
छोटी छोटी स्नेह भेंट …………..
कहा पेट भर सकेगी उनका
मनो खजाना ना मिलेगा ………

भूखे पेट से ज्यादा भूखा मन
बुलाऊ उसे ही जो भूखा हो
पेट भरे पत्तल परसी रोटी

पुलकित हो उसका मन
भरे पेट कभी भरते नही
परोसो कितना ही अन्न धन
सच्चा भूखा , सूखी रोटी
यही उसका संतोष धन

-नारायणी



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